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कबीर के दोहे अर्थ सहित

कबीर के 18 प्रसिद्ध दोहे, आसान हिंदी अर्थ के साथ।

🙏 आज का दोहा और सुविचार

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

अर्थ: दूसरों में बुराई खोजने निकला तो कोई बुरा नहीं मिला; अपने मन में झाँका तो पाया कि सबसे ज़्यादा सुधार की ज़रूरत मुझे ही है।

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करै, आपहुँ शीतल होय॥

अर्थ: अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी बात बोलें जो सुनने वाले को भी शांति दे और बोलने वाले को भी।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

अर्थ: हर काम अपने समय पर होता है। माली कितना भी पानी डाले, फल मौसम आने पर ही लगता है; इसलिए धैर्य रखें।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

अर्थ: सिर्फ़ किताबें पढ़ने से कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बनता; जो प्रेम को समझ ले, वही असली ज्ञानी है।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥

अर्थ: जो काम कल करना है उसे आज, और आज का काम अभी करें; समय का कोई भरोसा नहीं।

साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय॥

अर्थ: हे भगवान, बस इतना देना कि परिवार का पालन हो जाए, मैं भी भूखा न रहूँ और द्वार पर आया कोई भी भूखा न लौटे।

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥

अर्थ: अपनी कमियाँ बताने वाले को पास रखें; वह बिना साबुन-पानी के हमारे स्वभाव को साफ़ कर देता है।

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान॥

अर्थ: किसी सज्जन की जाति नहीं, उसका ज्ञान देखें; जैसे मोल तलवार का होता है, म्यान का नहीं।

दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय॥

अर्थ: दुख आने पर सब भगवान को याद करते हैं, सुख में कोई नहीं; जो सुख में भी याद रखे, उसे दुख कैसे घेरेगा।

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥

अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो, एक दिन तुम भी मुझमें ही मिलोगे; इसलिए घमंड न करें।

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

अर्थ: गुरु और भगवान दोनों सामने हों तो पहले गुरु को प्रणाम, क्योंकि उन्होंने ही भगवान तक पहुँचने का रास्ता दिखाया।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

अर्थ: सिर्फ़ बड़ा होना काफ़ी नहीं; खजूर का पेड़ ऊँचा है, पर न राही को छाया देता है, न फल आसानी से मिलते हैं। बड़प्पन दूसरों के काम आने में है।

कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढ़ै बन माहि। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि॥

अर्थ: हिरण की नाभि में ही कस्तूरी है, पर वह उसे जंगल में ढूँढ़ता है; वैसे ही भगवान हर हृदय में हैं, पर लोग बाहर खोजते हैं।

जैसे तिल में तेल है, ज्यों चकमक में आग। तेरा साईं तुझ में है, तू जाग सके तो जाग॥

अर्थ: जैसे तिल में तेल और पत्थर में आग छिपी है, वैसे ही भगवान तुम्हारे भीतर हैं; बस जागने की देर है।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥

अर्थ: बरसों माला फेरते रहे पर मन नहीं बदला; हाथ की माला से ज़्यादा ज़रूरी है मन को बदलना।

तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँवन तर होय। कबहुँ उड़ि आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय॥

अर्थ: पैरों तले पड़े तिनके को भी छोटा न समझें; आँख में पड़ जाए तो बहुत दर्द देता है। किसी को तुच्छ न समझें।

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप॥

अर्थ: न बहुत बोलना अच्छा, न बहुत चुप रहना; जैसे न ज़्यादा बारिश अच्छी, न ज़्यादा धूप। हर चीज़ में संतुलन रखें।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हिरदै साँच है, ताके हिरदै आप॥

अर्थ: सच के बराबर कोई तपस्या नहीं और झूठ के बराबर कोई पाप नहीं; जिसके मन में सच है, उसके मन में भगवान बसते हैं।

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