तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित
तुलसीदास के 8 प्रसिद्ध दोहे, आसान हिंदी अर्थ के साथ।
तुलसी मीठे बचन तें, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर॥
अर्थ: मीठे बोल से चारों ओर सुख फैलता है; सबका मन जीतने का यही मंत्र है, कठोर बोल छोड़ दें।
दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छाँड़िए, जब लग घट में प्रान॥
अर्थ: दया धर्म की जड़ है और घमंड पाप की; जब तक शरीर में प्राण हैं, दया न छोड़ें।
तुलसी साथी बिपति के, बिद्या बिनय बिबेक। साहस सुकृत सुसत्य ब्रत, राम भरोसो एक॥
अर्थ: मुसीबत में विद्या, विनम्रता, समझ, साहस, अच्छे कर्म, सच्चाई और भगवान पर भरोसा ही सच्चे साथी हैं।
काम क्रोध मद लोभ की, जौ लौं मन में खान। तौ लौं पंडित मूरखौ, तुलसी एक समान॥
अर्थ: जब तक मन में काम, क्रोध, घमंड और लोभ भरे हैं, तब तक विद्वान और मूर्ख में कोई अंतर नहीं।
आवत ही हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह। तुलसी तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥
अर्थ: जहाँ आपके आने पर कोई खुश न हो और आँखों में अपनापन न हो, वहाँ न जाएँ, चाहे वहाँ सोना ही क्यों न बरसता हो।
तुलसी इस संसार में, भाँति भाँति के लोग। सबसे हिल मिल चालिए, नदी नाव संजोग॥
अर्थ: संसार में तरह-तरह के लोग हैं; सबसे मिल-जुलकर रहें, क्योंकि जीवन नदी में नाव के मेल जैसा थोड़े समय का साथ है।
मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान कहुँ एक। पालै पोषै सकल अंग, तुलसी सहित बिबेक॥
अर्थ: मुखिया मुँह जैसा हो: मुँह अकेला खाता है, पर समझदारी से पूरे शरीर का पालन करता है। अगुवा सबका ध्यान रखे।
राम नाम मनि दीप धरु, जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥
अर्थ: अगर भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला चाहते हो, तो जीभ रूपी देहरी पर राम नाम का मणि-दीप रख दो।
और देखें
यह जानकारी भारतीय परंपरा और शास्त्रीय नियमों पर आधारित सामान्य मार्गदर्शन है, कोई गारंटी नहीं। हमारे बारे में · गोपनीयता