भगवद्गीता 2.13
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।2.13।।
dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati
अर्थ: जैसे शरीर में रहने वाला आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा पाता है, वैसे ही वह दूसरा शरीर पाता है। धीरज वाला मनुष्य इस बात से भ्रम में नहीं पड़ता।
Meaning: Just as the embodied self passes through childhood, youth and old age in this body, so it passes on to another body. The steady-minded person is not confused by this.
प्रसंग: आत्मा की नित्यता समझाते हुए श्रीकृष्ण परिवर्तन को जीवन का स्वाभाविक नियम बताते हैं।
जीवन से संबंध: बदलाव डराता है, पर हम हर दिन बदल रहे हैं। जो बदलता नहीं, वह भीतर का साक्षी है।
मन में रखने का विचार: आज किसी एक बदलाव को स्वीकार कीजिए जिसे आप रोक नहीं सकते।
भाव
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अध्याय 2: सांख्ययोग के सभी श्लोक
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