भगवद्गीता 18.47
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।18.47।।
śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham
अर्थ: दूसरे का धर्म अच्छी तरह निभाने से अपना धर्म कम गुणों वाला होकर भी बेहतर है। अपने स्वभाव से तय हुआ कर्म करने वाला पाप का भागी नहीं होता।
Meaning: Better is one's own dharma, though imperfect, than the dharma of another well performed. One who does the duty given by one's own nature incurs no sin.
प्रसंग: गीता के अंत में स्वधर्म के सिद्धांत को फिर दोहराया गया है।
जीवन से संबंध: आपका उद्देश्य आपके स्वभाव, कौशल और ज़िम्मेदारियों में छिपा है, दूसरों की नक़ल में नहीं।
मन में रखने का विचार: अपनी तीन प्राकृतिक क्षमताएँ लिखिए और सोचिए कि वे किसकी सेवा कर सकती हैं।
भाव
मिलते-जुलते श्लोक
अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग के सभी श्लोक
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